आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। हाल ही में रिलीज़ हुई ‘एडोलेसेंस’ सीरीज़ ने इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया है कि कैसे अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग बच्चों में जिद, गुस्सा, चिड़चिड़ापन और असंतोष जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है।
क्या आपके बच्चे भी हर वक्त फोन में व्यस्त रहते हैं?
क्या वे अनावश्यक चीजों की मांग करने लगे हैं?
क्या उनका गुस्सा और जिद बढ़ गया है?
अगर हां, तो यह लेख आपके लिए है! आइए जानें कि विशेषज्ञ इस समस्या को लेकर क्या कहते हैं और इसका समाधान कैसे निकाला जा सकता है।
सोशल मीडिया का बच्चों पर असर: क्या कहता है शोध?
आज के बच्चे मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट के बिना जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन क्या आपको पता है कि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है?
ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइकोलॉजी की एक रिपोर्ट के अनुसार:
12 से 18 साल के 65% किशोर सोशल मीडिया के कारण तनाव और अवसाद का शिकार हो रहे हैं।
78% बच्चे रात में देर तक फोन चलाने के कारण नींद की कमी (Insomnia) से जूझ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने वाले 53% बच्चे कम आत्मसम्मान (Low Self-Esteem) से जूझते हैं।
40% बच्चों में साइबरबुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं।
क्या आपके बच्चे पर भी यह असर हो सकता है?
समस्या को समझें: बच्चे सोशल मीडिया की लत का शिकार क्यों होते हैं?
डिजिटल दुनिया में दिखावे की होड़ – बच्चे सोशल मीडिया पर दूसरों की चमक-धमक भरी ज़िंदगी देखकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।
डोपामिन का प्रभाव – लाइक्स, कमेंट्स और शेयर से दिमाग में डोपामिन हार्मोन रिलीज़ होता है, जो बच्चों को बार-बार सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करता है।
गेमिंग और रील्स की लत – छोटे-छोटे वीडियो (Reels, Shorts) और ऑनलाइन गेमिंग में घंटों समय बिताना आम बात हो गई है।
साइबरबुलिंग और गलत कंटेंट का खतरा – इंटरनेट पर अश्लील सामग्री, गलत सूचना और साइबर अपराध बढ़ रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि हम अपने बच्चों को इससे कैसे बचाएं?
मनोवैज्ञानिकों की सलाह: कैसे बचाएं बच्चों को सोशल मीडिया के नुकसान से?
- खुली बातचीत करें
बच्चों को सोशल मीडिया के सही और गलत पहलुओं के बारे में जागरूक करें।
उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के बारे में नरमी से पूछें, उन पर शक करने के बजाय दोस्ताना रवैया अपनाएं।
- स्क्रीन टाइम सीमित करें
दिन में 2 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम न होने दें।
रात में सोने से 1 घंटे पहले मोबाइल पूरी तरह बंद करवा दें।
बच्चों के लिए “नो फोन ज़ोन” बनाएं (जैसे डाइनिंग टेबल और बेडरूम में फोन न हो)।
- वैकल्पिक गतिविधियों में व्यस्त करें
बच्चों को खेलकूद, पेंटिंग, किताबें पढ़ने, योग और मेडिटेशन जैसी गतिविधियों में शामिल करें।
परिवार के साथ बाहर घूमने की आदत डालें, ताकि वे स्क्रीन से दूरी बना सकें।
- रोल मॉडल बनें
माता-पिता खुद भी मोबाइल का कम उपयोग करें।
बच्चों को “डिजिटल डिटॉक्स” (Digital Detox) का महत्व समझाएं।
- साइबर सुरक्षा का ध्यान रखें
बच्चों को सुरक्षित इंटरनेट उपयोग की जानकारी दें।
पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स का उपयोग करें, ताकि वे गलत कंटेंट से दूर रहें।
उन्हें सिखाएं कि ऑनलाइन किसी अजनबी से बात न करें और साइबरबुलिंग से बचें।
क्या करें माता-पिता?
संतुलन बनाएं: सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना सही समाधान नहीं है, बल्कि बच्चों को इसका सही उपयोग सिखाना जरूरी है।
सहयोग करें: बच्चों को भावनात्मक रूप से समझें और उनकी चिंताओं को सुनें।
प्रेरित करें: उन्हें ऐसी गतिविधियों में व्यस्त करें जो उनके व्यक्तित्व विकास में मदद करें।
यदि आप अपने बच्चों की डिजिटल आदतों को सुधारना चाहते हैं, तो अभी से सही कदम उठाएं।
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