Arthritis

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राउरकेला (NIT-R) के वैज्ञानिकों ने हड्डी की मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए एक खास तरह की स्याही (बायो-इंक) विकसित की है। इस बायो-इंक का उपयोग 3डी प्रिंटिंग तकनीक से हड्डी की नई संरचना बनाने में किया जा सकता है। ईटी में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इस खोज का नेतृत्व जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर देवेंद्र वर्मा ने किया है। यह तकनीक भविष्य में हड्डी से जुड़ी सर्जरी और इलाज को आसान बना सकती है।

बायो-इंक क्या है और इसमें क्या सामग्री है?

बायो-इंक एक तरह की जैव-संगत (biocompatible) स्याही है, जिसे 3डी प्रिंटर से इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक सामग्री से बनी है, जो हड्डी पुनर्जनन (bone regeneration) में सहायक होती है। इस बायो-इंक में मुख्य रूप से तीन चीजें शामिल हैं:

  1. Chitosan: यह एक प्राकृतिक पदार्थ है, जो समुद्री जीवों के खोल (shell) से प्राप्त किया जाता है। यह ऊतकों (tissues) को तेजी से ठीक करने और हड्डी के विकास में मदद करता है।
  2. Gelatin: यह एक प्रकार का प्रोटीन है, जो कोशिकाओं को सही ढंग से विकसित होने और जुड़ने में सहायता करता है।

3.Nano-Hydroxyapatite: यह एक खनिज पदार्थ है, जो हड्डियों में पाया जाता है और हड्डी की मजबूती बढ़ाने का काम करता है।

यह बायो-इंक कैसे काम करेगी?

यह बायो-इंक 3डी प्रिंटिंग तकनीक की मदद से हड्डी के टूटे या खराब हिस्सों को दोबारा बनाने में मदद कर सकती है। 3डी प्रिंटर इस स्याही को एक खास संरचना में प्रिंट करेगा, जिससे यह धीरे-धीरे नई हड्डी के निर्माण को प्रेरित करेगी।

जब यह बायो-इंक शरीर में डाली जाएगी, तो यह वहां नई कोशिकाओं (cells) को बढ़ने में मदद करेगी और हड्डी को फिर से मजबूत बनाएगी। यह तकनीक उन मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद हो सकती है, जिनकी हड्डी किसी दुर्घटना, बीमारी या उम्र बढ़ने की वजह से कमजोर हो गई है।

कहां-कहां हो सकता है इसका उपयोग?

यह बायो-इंक कई तरह की चिकित्सा प्रक्रियाओं में उपयोगी हो सकती है:

  1. ऑर्थोपेडिक सर्जरी: टूटी हुई हड्डियों को ठीक करने और जोड़ने में मदद मिलेगी।
  2. डेंटल इम्प्लांट: दांतों से जुड़ी समस्याओं में जबड़े की हड्डी को दोबारा बनाने में सहायक होगी।
  3. टिशू इंजीनियरिंग: शरीर के अन्य ऊतकों के पुनर्निर्माण में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस तकनीक के लाभ

यह प्राकृतिक रूप से हड्डी को दोबारा बनने में मदद करती है, जिससे शरीर के लिए इसे स्वीकार करना आसान होता है।

यह हड्डी ट्रांसप्लांट या अन्य जटिल सर्जरी की जरूरत को कम कर सकती है।

यह तकनीक मरीजों की रिकवरी (ठीक होने) की प्रक्रिया को तेज कर सकती है।

इसका उपयोग भविष्य में कई अन्य चिकित्सा क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं की राय

प्रोफेसर देवेंद्र वर्मा ने कहा, “यह बायो-इंक पूरी तरह से जैव-संगत और प्रभावी है। हम इसे और अधिक परीक्षणों के जरिए यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि यह हड्डी पुनर्जनन में अधिक प्रभावी साबित हो। यह तकनीक भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।”

NIT राउरकेला के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह बायो-इंक हड्डी पुनर्जनन की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है। इससे न केवल हड्डी से जुड़ी सर्जरी को आसान बनाया जा सकेगा, बल्कि मरीजों को जल्दी और सुरक्षित उपचार भी मिल सकेगा। यह शोध चिकित्सा जगत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और भविष्य में नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।

(यह जानकारी इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित है।)

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