Mental Health

वह दिन दूर नहीं जब दुनिया भर में ब्रेन स्ट्रोक से मरने वाले लोगों की तादाद सर्वाधिक होगी। न्यू स्टडी के मुताबिक क्लाइमेट चेंज मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

स्ट्रोक,मेनिनजाइटिस, माइग्रेंस, एपिलेप्सी, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, सिजोफ्रेनिया, अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी बीमारियां पहले विरले हीं सुनने को मिलती थीं लेकिन इन दिनों इससे पीड़ित लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। कुछ शोधकर्ता इसे कोविड से जोड़कर देख रहे थे लेकिन नए अध्ययन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। नए शोध के मुताबिक इन बीमारियों की चपेट में आने वाले लोगों की बढ़ती तादाद और बिगड़ते हालात के लिए क्लाइनेट चेंज एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।

क्लाइमेट चेंज और मेंटल डिजीज (Mental Health)
दरअसल मौसम और प्रकृति में होने वाले किसी भी तरह के बदलाव का सीधा असर हमारे ब्रेन पर पड़ता है जैसे की अत्यधिक तापमान और ह्यूमिडिटी। ऐसी स्थिति में जब शरीर तापमान के नियंत्रण के लिए अत्यधिक पसीना छोड़ता है तो ब्रेन से हमे सिग्नल मिलता है की ठंडे स्थान की तरफ जाएं और हम चल पड़ते हैं।

हमारे मस्तिष्क में विद्यमान बिलियंस ऑफ न्यूरॉन्स एक कंप्यूटर की तरह काम करते हैं, कोडिंग और डिकोडिंग करते है। पलक झपकते इनमे से हर हिस्सा स्थिति और परिस्थिति को समझते हुए शरीर के लिए त्वरित निर्णय लेता है। ये सभी एक निश्चित तापमान में बेहतर परफॉर्मेंस कर सकते है। तापमान में होने वाला बदलाव इनके परफॉर्मेंस और हेल्थ दोनो को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। जब तापमान या ह्यूमिडिटी इतना बढ़ जाए की शरीर उसके मुताबिक खुद को एडजस्ट करने के लिए स्ट्रगल करने लगे तो इसका सबसे बुरा प्रभाव हमारे मेंटल हेल्थ पर देखा जाता है।

ऐसे में शरीर को एडजस्ट करने के लिए पर्याप्त पसीना निकालने का सिग्नल ब्रेन से प्रभावित हो सकता है, शरीर को गर्मी और ह्यूमिडिटी के अनुकूल तापमान एडजस्ट करने का सिगनल ब्रेन से प्रभावित हो सकता है। या फिर एक्सट्रीम कोल्ड में इसके विपरित भी हो सकता है की ब्रेन से शरीर को उचित सिग्नल न मिले और शरीर जरूरी तापमान नियंत्रण करने में असफल हो जाए। ब्रेन संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर इस असामान्य स्थिति के कारण दवाओं का प्रभाव भी कॉम्प्रोमाइज हो सकता है।

हीट वेव (Heat Wave) और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा

हीट वेव की स्थिति में हालात सबसे ज्यादा खराब देखे गए हैं। स्टडी के मुताबिक हीट वेव से स्लीप पैटर्न डिस्टर्ब होता है, इससे एपिलेप्सी की संभावना बढ़ सकती है। हीटवेव के कारण ब्रेन की वायरिंग में फॉल्ट क्रिएट हो सकता है और ऐसे में मल्टीपल एक्लेरोसिस के मरीज की हालत खराब हो सकती है । तापमान अत्यधिक होने से शरीर में खून का घनत्व बढ़ जाता है जिससे डिहाइड्रेशन और हीट वेव की स्थिति में ब्लड क्लोटिंग की संभावना बढ़ती है जिससे स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। तापमान के बढ़ने के साथ हीं अस्पतालों में डिमेंशिया के मरीजों की तादाद में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है। एपिलेप्सी के मरीजों में सीजर कंट्रोल करना मुश्किल होने लगता है। ऐसे हालात में स्ट्रोक से होने वाली मौत की संख्या बढ़ जाती है। बढ़ते तापमान और हीट वेव की स्थिति में कॉमन और सीरियस साइकेट्रिक कंडीशन भी लोगों में देखे जाते हैं। जो लोग पहले से मेंटल डिजीज से पीड़ित है उनमें दौरे पड़ने लगते हैं।


स्टडी में पाया गया है की मौसम में होने वाले अचानक परिवर्तन, एक्सट्रीम वेदर का हार्मफुल इफेक्ट मेंटल और न्यूरोलॉजिकल कंडीशन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। हीट वेव के अलावा अचानक आने वाला फ्लड, आंधी तूफान, सुनामी का भी प्रभाव मेंटल हेल्थ पर पड़ता हैं।
स्टडी में इस बात पर भी चिंता जताई गई है की शहरों में जिस तरह से ग्रीन बेल्ट कम होते जा रहा है और कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं उससे भी तापमान की बढ़ोतरी में बड़ा योगदान हो रहा है। उपलब्ध डेटा के मुताबिक दुनियाभर में 60 मिलियन लोगों को एपिलेप्सी है, 55 मिलियन लोगों को डिमेंशिया और इनमे से 60 फीसदी लोग विकाशसील देशों में रहते हैं। अनुमान के मुताबिक क्लाइमेट चेंज के कारण 2050 तक यह संख्या बढ़कर 150 मिलियन तक पहुंच सकती है। दुनिया भर ने मौत का सबसे बड़ा कारण आने वाले दिनों में स्ट्रोक हो सकता है।

बचाव के लिए क्या करें

इस भयावय स्थिति से दुनिया भर में सरकारों को कड़े कदम उठाने होंगे ताकि क्लाइमेट चेंज पर नियंत्रण हो सके लेकिन इसमें लंबा वक्त लगेगा। इस बीच एक्सट्रीम वेदर और क्लाइमेट चेंज से खुद को बचाने के लिए लोगो को अलर्ट रहने की जरूरत है। इसके कुप्रभाव से बचने के लिए सबसे पहले तो लोगों को लोकल वेदर अलर्ट से जुड़े रहना चाहिए ताकि मौसमी बदलाव की जानकारी उन्हें मिलती रहे। मौसम में होने वाले बदलाव के मुताबिक अपने रूटीन, प्लान और प्रोग्राम को सेट करें ताकि आप इससे खुद का बचाव कर सकें।

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